सारांश: Character Building Stories for Kids
सुनगांव शहर में रहने वाला तिलक, पढ़ने में होशियार था पर छोटी-छोटी बातों पर झूठ बोलने की बुरी आदत थी, इसलिए उसे सब 'चालाक तिलक' कहते थे। एक दिन उसे एक जादुई नीली कलम मिली, जिसने कहा कि वह केवल सच्चे बच्चों के लिए काम करेगी। जब भी तिलक झूठ बोलकर कलम का इस्तेमाल करने की कोशिश करता, तो या तो स्याही गायब हो जाती या उसका काम मिट जाता।
चित्रकला प्रतियोगिता में झूठ बोलकर जीतने की कोशिश करने पर उसका चित्र मिट गया, जिससे वह शर्मिंदा हुआ और उसने रोकर अपनी गलती (झूठ बोलने) को स्वीकार किया। सच्चाई बोलते ही कलम फिर से चमकी और चित्र वापस आ गया। इस घटना के बाद, तिलक ने झूठ बोलना छोड़ दिया और सब उसे 'सच्चा तिलक' कहकर पुकारने लगे। तिलक ने सीखा और दूसरों को भी बताया कि सच्चाई ही सबसे बड़ा जादू है।
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कॉपीराइट © 2026 MiMi Flix
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यह पुस्तक बच्चों के लिए नैतिक एवं जीवन-मूल्य आधारित कहानी के रूप में तैयार की गई है। इसमें प्रस्तुत सभी पात्र, घटनाएँ और स्थान पूर्णतः काल्पनिक हैं। किसी वास्तविक व्यक्ति, स्थान, संस्था या घटना से इनका कोई भी साम्य संयोग मात्र है।
इस पुस्तक में दी गई सीख और विचार बच्चों में सकारात्मक सोच, ईमानदारी, आत्म-विश्वास और अच्छे व्यवहार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं। इसका आशय किसी भी प्रकार का दबाव, निर्देश या निर्णय थोपना नहीं है, बल्कि बच्चों को सरल कहानियों के माध्यम से जीवन-मूल्यों से परिचित कराना है।
यह ईबुक सभी आयु वर्ग के पाठकों के लिए सुरक्षित है, विशेष रूप से 7–12 वर्ष के बच्चों के लिए। अभिभावकों और शिक्षकों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे बच्चों के साथ मिलकर इस कहानी का पठन करें और इससे जुड़े विचारों पर सकारात्मक चर्चा करें।
प्रकाशक: MiMi Flix | प्रकाशन तिथि: 3 फ़रवरी 2026
प्रस्तावना
हर बच्चे के दिल में एक छोटी-सी जादुई दुनिया होती है, जहाँ कल्पनाएँ उड़ान भरती हैं और सीख धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बनती है। कहानियाँ उसी दुनिया की चाबी होती हैं—वे न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि बच्चों को सही और गलत के बीच अंतर समझाने में भी मदद करती हैं।
“नन्हा तिलक और सच्चाई की जीत” ऐसी ही एक कहानी है, जो हमें सिखाती है कि होशियारी और चालाकी से मिली सफलता क्षणिक होती है, लेकिन सच्चाई और ईमानदारी से पाया गया सम्मान जीवन भर साथ रहता है। तिलक की कहानी हर उस बच्चे की कहानी है, जो कभी न कभी आसान रास्ता चुनने के लिए सच से दूर चला जाता है, लेकिन अंत में यह समझता है कि सच्चाई ही सबसे बड़ी शक्ति है।
इस पुस्तक के माध्यम से बच्चों को सरल भाषा और रोचक घटनाओं के ज़रिए यह संदेश दिया गया है कि गलती करना गलत नहीं है, लेकिन गलती छुपाने के लिए झूठ बोलना हमें कमजोर बनाता है। जब हम सच बोलने का साहस करते हैं, तो न केवल दूसरों का भरोसा जीतते हैं, बल्कि अपने आप पर भी गर्व महसूस करते हैं।
यह कहानी बच्चों को यह भी सिखाती है कि सच्चाई बोलना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन वही हमें भीतर से मजबूत बनाता है। जब कोई बच्चा अपनी गलती स्वीकार करता है, तो वह डर से नहीं, बल्कि आत्म-विश्वास से आगे बढ़ता है। यही आत्म-विश्वास आगे चलकर उसके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान बनता है।
हमें आशा है कि यह कहानी बच्चों के मन में ईमानदारी, आत्म-विश्वास और अच्छे संस्कारों के बीज बोएगी। अभिभावकों और शिक्षकों से निवेदन है कि वे बच्चों के साथ मिलकर इस कहानी को पढ़ें और इससे मिलने वाली सीख पर खुलकर चर्चा करें।
MiMi Flix की ओर से यह छोटा-सा प्रयास बच्चों की दुनिया को बेहतर मूल्यों और सकारात्मक सोच से भरने की दिशा में एक कदम है।
झूठ की शुरुआत
एक समय की बात है, भारत के हरे-भरे मैदानों के बीचों-बीच एक अत्यंत मनमोहक और शांत शहर बसा हुआ था, जिसका नाम था सुनगांव। सचमुच, इस शहर का हर कोना जैसे सोने की धूप से नहाया हुआ प्रतीत होता था। सुनगांव की पहचान उसकी ख़ुशहाली, उसकी साफ़-सफ़ाई और सबसे बढ़कर, वहाँ के चंचल और उत्साही बच्चों से थी।
स्कूल के मैदान हों या शाम की गलियाँ, हर जगह बच्चों की खिलखिलाहट गूँजती रहती थी। सुनगांव के बच्चे सुबह होते ही अपनी किताबों और बस्तों के साथ ज्ञान की तलाश में निकल पड़ते थे, दिन भर पढ़ाई में मग्न रहते और स्कूल की घंटी बजते ही मैदान में खेल और हँसी-मज़ाक की दुनिया में खो जाते थे। यहाँ जीवन सरल और मीठी धुन की तरह बहता था।
इसी ख़ुशहाल और शिक्षा से भरे शहर में, एक प्यारा और मासूम दिखने वाला बच्चा रहता था, जिसका नाम था तिलक। तिलक की आँखें बड़ी और चमकदार थीं, और उसके चेहरे पर हमेशा एक शरारती मुस्कान रहती थी। इसमें कोई शक नहीं कि तिलक अपनी कक्षा के सबसे होशियार बच्चों में गिना जाता था। वह सवालों के जवाब तेज़ी से देता था और गणित के मुश्किल से मुश्किल सवाल भी आसानी से हल कर लेता था। उसके अध्यापक भी उसके तेज दिमाग की तारीफ़ करते नहीं थकते थे।
मगर, तिलक की इस प्रतिभा के साथ एक बड़ी और बुरी आदत भी जुड़ी हुई थी, जिसने धीरे-धीरे उसके अच्छे नाम को धूमिल करना शुरू कर दिया था। वह आदत थी— छोटे-छोटे, बेमतलब के झूठ बोलना। ये झूठ इतने मामूली होते थे कि शायद किसी बड़े को पता भी न चलता, पर तिलक की ज़बान पर ये हमेशा चिपके रहते थे। जैसे, अगर कोई उसे शरारत करते हुए पकड़ लेता, तो वह तुरंत एक मासूम सा चेहरा बनाकर कहता, “अरे, ये मैंने नहीं किया!” मानो वह कोई और बच्चा हो जिसने यह गलती की हो।
उसकी यह आदत ख़ास तौर पर तब ज़ोर पकड़ती थी जब उसे कोई काम पूरा न करना हो। उदाहरण के लिए, जिस दिन वह अपना गृहकार्य (होमवर्क) नहीं कर पाता था, उस दिन वह अपनी गलती मानने के बजाय एक बड़ी-सी कहानी गढ़ देता था। वह आत्मविश्वास से भरकर कहता, “मैम/सर, मेरी तो कॉपी ही गायब हो गई! मैंने रात को उसे मेज़ पर रखा था, पर सुबह वह मिली ही नहीं।
ज़रूर कल रात को कोई शैतान उठाकर ले गया होगा!” और जब वह किसी नियम को तोड़ता या किसी से झगड़ा करता, तो अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय, वह तुरंत पलटकर बोल देता, “इसमें मेरी कोई गलती नहीं है! मैंने कुछ भी नहीं किया!” और अपनी बात को सही साबित करने के लिए वह सौ बहाने बनाता।
शुरुआत में तो लोगों ने उसे अनदेखा किया, पर जब उसकी यह झूठ बोलने की आदत बढ़ती गई, तो शहर के बच्चों और यहाँ तक कि बड़ों ने भी उसके असली व्यक्तित्व को पहचानना शुरू कर दिया। उसकी होशियारी अब उसकी झूठ बोलने की कला के नीचे छिपने लगी थी। धीरे-धीरे, तिलक का प्यारा नाम बदल गया, और सब बच्चे उसे फुसफुसाते हुए “चालाक तिलक” कहकर पुकारने लगे थे। यह उपनाम उसकी पहचान बन गया था, एक ऐसी पहचान जो उसके तेज़ दिमाग की नहीं, बल्कि उसकी छोटी-छोटी चालाकियों और झूठों की कहानी कहती थी।





